Tuesday, June 6, 2017

सुन रही हो पुष्पा



" माँ...कितनी बार कहा आपसे मेरा कमरा ठीक मत किया करो.... मेरी डायरी नहीं मिल रही। "

" हवा में नज़र रखता है। ठीक से देख। वहीं कहीं होगी। एक तो कमरा सड़ा के रखता है। ठीक कर दो तो इसकी दो बातें सुनो। "

" नहीं मिल रही यार माँ। आज के बाद फिर मेरी चीजों को हाथ मत लगाना। पता नहीं क्या परेशानी है इनको। "

"ऐसे बात करतें हैं अपनी माँ से ? इज़्ज़त करना सीखो बरखुरदार ! हमारे समय में मज़ाल हम.... "

" डैड प्लीज़ अब फिर से शुरू मत हो जाना। आप अपने समय से आगे क्यों नहीं बढ़ते कभी ? कुछ कदम ? वो पास्ट था... गया... अब प्रेजेंट की बात करिए डैड डिअर । "

"बद्तमीज़ होता जा रहा है ये लड़का। सुन रही हो...पुष्पा..." जवानी के दिनों में कितनी भी नोक झोंक क्यों न रही हो। बच्चों के जवान होते ही माता -पिता अपने दुःख -दर्द साझा करते हुए एक होने लगते हैं।  


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