Monday, May 29, 2017

एक हमारा ज़माना था



" सुन क्या कर रही है तू तब से ? चल आ खाना खा ले पहले। 

"टू मिनट्स माँ। " वह मोबाईल से आंखें नहीं हटा पाती। 

"आग लगे इस मोबाईल को। मोबाईल..और आजकल की ये नई पौध। जल्दी आ, फिर मैं किचन समेटूं। चंद्रा आती ही होगी। बर्तनों में पानी डाल कर नहीं रखो तो उसकी मिच -मिच सुनूं। क्या -क्या देखे औरत।"

"माँ यार क्या सुबह -सुबह। क्यों इतने काम अपनी जान को ले रखें हैं ? परेशान मत हो। चिल करो। हो जायेंगे। "

" हो जायेंगे ? बस तूने कह दिया और हो गए सारे काम। ससुराल जाओगी तब पता लगेगा। जब हम शादी करके इस घर में आये थे सारे कुनबे को...." 

"हो गए शुरू ? लाओ दो यार खाना। माँ... व्हॉट ? टिण्डा यक्क। "

" क्या टिण्डा .. लोगों को एक जून की रोटी नहीं मिल रही और तुम्हारे ये नखरे? अरे एक हमारा ज़माना था। हम पांच भाई -बहन थे। मजाल घर में.... " 

" माँ दे दो यार टिण्डा । खा लुंगी। बस फिर से अपने ज़माने की रामायण न शुरू कर देना। चिल... कूल। " 




Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...