Thursday, August 17, 2017

तू न चलेगा तो चल देंगी राहें


इस 
दुनिया में
 जितने तरह के नाम है 
उतने ही तरह के निराले इंसान  
जैसे 
इस धरा में 
पुष्पित हुए हैं पुष्प 
नाना प्रजाति नाना प्रकार के 
उनके 
रंग अलग हैं 
सुवास भी अलग सी 
आकार अलग प्रकार अलग 
गोया 
एक आंगन में 
एक ही तरह के संस्कार 
एक सा व्यवहार मिलने पर भी  
कुछ 
बन जातें हैं 
अच्छे विचारों के संवाहक 
कोई संसार की हर बात से ख़फ़ा 
कोई 
हो जाता है 
मीठा मधु फूलों सा प्यारा 
कोई नीम कड़वा गुलाब का कांटा 
चंद 
दुनिया से दुखी 
हर बात हालात से नाराज़
कुछ रहतें हैं हर हाल आनंदित 
हमें 
खूब रास आती है 
कड़वाहट नीम करेले की 
नागफनी से तो बेइंतहा मोहोब्बत है ही 



Sunday, August 6, 2017

बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा न कोई


"दूसरों के गुणों की तरफ देखो और अपने दोषों की तरफ।" माँ हमेशा कहती है।

"तो माँ, कुल जमा ये कि सारी दुनिया बेहद अच्छी और मैं ??" माँ हंस देती है।  इस फ़लसफ़े से तो मैं हमेशा अपने आप को दोषों से परिपूर्ण ही देखती रहूं।

" माँ केवल हंस कर बात मत टालो। क्या सच में मुझे अपने आप को इसी नज़र से देखना चाहिए? आजकल इस कलयुग में कहते हैं अपने आप से प्यार करो अपनी इज़्ज़त करो तभी दुनिया का रुख भी तुम्हारे प्रति अच्छा रहेगा ? ऐसा। "

" हे ईश्वर कौन कहता है ऐसा..?"  माँ असमंजस में दिखी।

" सब कहतें हैं मदरलैंड। "

"कौन सब ?"

" माँ तुम सतयुग की बात कर रहे हो। आजकल अपने को गुणवान और दूसरों को गलत और बुरा समझना चाहिए। ऐसा रिवाज़ है, और वो ही ठीक है। "

"हाय.. ऐसा कब से हो गया ? ऐसा कभी भी नहीं होता। पता नहीं कहाँ सुनके आती है ऐसा गन्दा।  छी...बेकार हुयी तू सच्ची।  माँ स्तब्ध।

"कतई बेकार हुए यार माँ मैं।  सभी कहते हैं। "



Monday, July 31, 2017

कलयुग की भग्वद गीता ( व्हाट्सऐप से प्राप्त ज्ञान )


हे पार्थ,  ||  तुम पिछले मेसेज का पश्चाताप मत करो ||  || तुम अगले मेसेज की चिंता भी मत करो ||  || बस अपने करंट मेसेज से ही प्रसन्न रहो ||  

|| तुम जब नहीं थे, तब भी ये मेसेजो का चलन रहा था ||  || तुम जब नहीं होगे, तब भी ये मेसेजो का चलन चलता रहेगा ||  जो मेसेज आज तुम्हारा है, कल किसी और का था ||  वो कल किसी और का होगा ||  तुम इसे अपना समझ कर मगन हो रहे हो ||  यही तुम्हारे समस्त दुखों का कारण है ||  

बहुत बढ़िया   लाइक   धन्यवाद  जैसे शब्द अपने मन से निकाल दो || निष्काम भाव से मैसेज करो..फिर देखो तुम इस व्हाट्सऐप रूपि भवसागर में रहते हुए भी इस के समस्त कुप्रभावों से दूर रह कर स्वर्ग लोक को प्राप्त होगे  ||  राधे -राधे। 

जन्म लिया है तो सिर्फ साँसे मत लीजिये, जीने का शौक भी रखिये...कुछ रिश्ते भगवान बनाता है.... और कुछ रिश्ते whatsapp .



ॐ शांति शांति शांति:
॥शुभम् भवतु॥




Tuesday, July 4, 2017

मेरा नाम करेगा रोशन जग में मेरा राज दुलारा



"अजी सुनते हो...कहाँ चले गए ?" 

" पंछी उठ गए। दुनिया उठ कर कहाँ से कहाँ पहुँच गयी। और एक ये महाशय हैं। सुबह के दस बज गए अभी तक सोता पड़ रहा है। बेटा जी, ऐसे नाम रोशन करोगे माँ -बाप का..हम्म।"

" डैड फिर आ गए आप...माँ यार...समझाओ अपने पति को। कमसकम सन्डे को तो सोने दो....रात देर तक पढ़ रहा था मैं।" करवट बदल कर तकिया के नीचे चेहरा छुपा कर वह फिर सो गया। 

" हमने तो कभी पढ़ा ही नहीं। घास काट कर क्लास वन अफ़सर बन गए। घर भर के कितने काम कर देते थे सुबह मुंह अँधेरे उठ कर...ये आजकल की औलादें। अपने से बड़ों की इज़्ज़त करना जैसे सीखा ही नहीं कभी।" 

" केवल बड़े हो इसलिए इज़्ज़त करें ? और.. और बताइये किस लिए इज़्ज़त करें ? सिवाय ताने देने के आप करतें ही क्या हैं ? हम ऐसे... तू ऐसा...फलां का बेटा इतना काबिल.. तू इतना नालायक...शर्मा अंकल ने अपने बेटे को बी एम डब्ल्यू दी है इस बर्थ डे पर। अब ?....आप क्या देंगे मुझे ? ख़ामख़्वाह ...डैड आप रहने दो...प्लीज़। खाली सुबह -सुबह..." 

" अजी सुनते हो। पड़े रहने दो नालायक को। आ जाओ। चाय ठंडी हो रही है।" पत्नी न मालूम किसे बचाने का प्रयास करती है। फटकार खाते जवान, धैर्यहीन बेटे को ? या फिर बेटे से दो टूक जवाब सुनते, शर्मिंदगी उठाते पति को। 

Tuesday, June 27, 2017

नंदादेवी के घर में महादेवी - मीरा कुटीर - रामगढ़, नैनीताल ( उत्तराखंड )

विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही 
उमड़ी कल थी मिट आज चली।  
मैं नीर भरी दुःख की बदली।




    





Tuesday, June 6, 2017

सुन रही हो पुष्पा



" माँ...कितनी बार कहा आपसे मेरा कमरा ठीक मत किया करो.... मेरी डायरी नहीं मिल रही। "

" हवा में नज़र रखता है। ठीक से देख। वहीं कहीं होगी। एक तो कमरा सड़ा के रखता है। ठीक कर दो तो इसकी दो बातें सुनो। "

" नहीं मिल रही यार माँ। आज के बाद फिर मेरी चीजों को हाथ मत लगाना। पता नहीं क्या परेशानी है इनको। "

"ऐसे बात करतें हैं अपनी माँ से ? इज़्ज़त करना सीखो बरखुरदार ! हमारे समय में मज़ाल हम.... "

" डैड प्लीज़ अब फिर से शुरू मत हो जाना। आप अपने समय से आगे क्यों नहीं बढ़ते कभी ? कुछ कदम ? वो पास्ट था... गया... अब प्रेजेंट की बात करिए डैड डिअर । "

"बद्तमीज़ होता जा रहा है ये लड़का। सुन रही हो...पुष्पा..." जवानी के दिनों में कितनी भी नोक झोंक क्यों न रही हो। बच्चों के जवान होते ही माता -पिता अपने दुःख -दर्द साझा करते हुए एक होने लगते हैं।  


Monday, May 29, 2017

एक हमारा ज़माना था



" सुन क्या कर रही है तू तब से ? चल आ खाना खा ले पहले। 

"टू मिनट्स माँ। " वह मोबाईल से आंखें नहीं हटा पाती। 

"आग लगे इस मोबाईल को। मोबाईल..और आजकल की ये नई पौध। जल्दी आ, फिर मैं किचन समेटूं। चंद्रा आती ही होगी। बर्तनों में पानी डाल कर नहीं रखो तो उसकी मिच -मिच सुनूं। क्या -क्या देखे औरत।"

"माँ यार क्या सुबह -सुबह। क्यों इतने काम अपनी जान को ले रखें हैं ? परेशान मत हो। चिल करो। हो जायेंगे। "

" हो जायेंगे ? बस तूने कह दिया और हो गए सारे काम। ससुराल जाओगी तब पता लगेगा। जब हम शादी करके इस घर में आये थे सारे कुनबे को...." 

"हो गए शुरू ? लाओ दो यार खाना। माँ... व्हॉट ? टिण्डा यक्क। "

" क्या टिण्डा .. लोगों को एक जून की रोटी नहीं मिल रही और तुम्हारे ये नखरे? अरे एक हमारा ज़माना था। हम पांच भाई -बहन थे। मजाल घर में.... " 

" माँ दे दो यार टिण्डा । खा लुंगी। बस फिर से अपने ज़माने की रामायण न शुरू कर देना। चिल... कूल। " 




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