Tuesday, June 6, 2017

सुन रही हो पुष्पा



" माँ...कितनी बार कहा आपसे मेरा कमरा ठीक मत किया करो.... मेरी डायरी नहीं मिल रही। "

" हवा में नज़र रखता है। ठीक से देख। वहीं कहीं होगी। एक तो कमरा सड़ा के रखता है। ठीक कर दो तो इसकी दो बातें सुनो। "

" नहीं मिल रही यार माँ। आज के बाद फिर मेरी चीजों को हाथ मत लगाना। पता नहीं क्या परेशानी है इनको। "

"ऐसे बात करतें हैं अपनी माँ से ? इज़्ज़त करना सीखो बरखुरदार ! हमारे समय में मज़ाल हम.... "

" डैड प्लीज़ अब फिर से शुरू मत हो जाना। आप अपने समय से आगे क्यों नहीं बढ़ते कभी ? कुछ कदम ? वो पास्ट था... गया... अब प्रेजेंट की बात करिए डैड डिअर । "

"बद्तमीज़ होता जा रहा है ये लड़का। सुन रही हो...पुष्पा..." जवानी के दिनों में कितनी भी नोक झोंक क्यों न रही हो। बच्चों के जवान होते ही माता -पिता अपने दुःख -दर्द साझा करते हुए एक होने लगते हैं।  


Monday, May 29, 2017

एक हमारा ज़माना था



" सुन क्या कर रही है तू तब से ? चल आ खाना खा ले पहले। 

"टू मिनट्स माँ। " वह मोबाईल से आंखें नहीं हटा पाती। 

"आग लगे इस मोबाईल को। मोबाईल..और आजकल की ये नई पौध। जल्दी आ, फिर मैं किचन समेटूं। चंद्रा आती ही होगी। बर्तनों में पानी डाल कर नहीं रखो तो उसकी मिच -मिच सुनूं। क्या -क्या देखे औरत।"

"माँ यार क्या सुबह -सुबह। क्यों इतने काम अपनी जान को ले रखें हैं ? परेशान मत हो। चिल करो। हो जायेंगे। "

" हो जायेंगे ? बस तूने कह दिया और हो गए सारे काम। ससुराल जाओगी तब पता लगेगा। जब हम शादी करके इस घर में आये थे सारे कुनबे को...." 

"हो गए शुरू ? लाओ दो यार खाना। माँ... व्हॉट ? टिण्डा यक्क। "

" क्या टिण्डा .. लोगों को एक जून की रोटी नहीं मिल रही और तुम्हारे ये नखरे? अरे एक हमारा ज़माना था। हम पांच भाई -बहन थे। मजाल घर में.... " 

" माँ दे दो यार टिण्डा । खा लुंगी। बस फिर से अपने ज़माने की रामायण न शुरू कर देना। चिल... कूल। " 




Wednesday, May 17, 2017

उलझे हुए हैं आज सवालों की भीड़ में


जब 
हम सीख लेते हैं 
कहना सुनना और शब्दों से खेलना 
हमें 
लगता है 
हमने कविता कह दी 
जब 
हम सीख लेते हैं 
हंसना कुहुकना और चहकना 
हमें 
लगता है 
हम मलंग हो गए हैं 
जब
 हम सीख लेते हैं 
सड़कों जंगलों में भटकना 
हमें लगता है हम यायावर हो गए 
जब 
हम सीख लेते हैं 
मुस्करा कर आगे बढ़ जाना 
हमें 
लगता है 
हम जीना सीख गए हैं 
हम 
होते कुछ हैं
 खुद को समझ कुछ और लेते हैं


Tuesday, April 18, 2017

यात्रा - पत्रिका 'अहा! ज़िंदगी' के अप्रैल 2017 अंक में प्रकाशित हिमाचल यात्रा वृत्तांत

अभी सफ़र में कोई मोड़ ही नहीं आया 
निकल गया है ये चुपचाप दास्तान से कौन   
( अख्तर शुमार )


हिमाचल प्रदेश की रोमांचक यात्रा 
( संपादक - आलोक श्रीवास्तव )



Thursday, March 23, 2017

तेरी है ज़मीं तेरा आसमान


कहने वाले कहते हैं ईश्वर को जहाँ देखो वहीं दीखते हैं। बस मन में श्रद्धा होनी चाहिए। शायद वो सभी महान श्रद्धालु होते हैं जिन्हें देवताओं के सर्वत्र दर्शन होतें हैं। सोसाइटी के बाहर पेड़ों के नीचे, मंदिरों के प्रांगण में या मंदिरों के आस -पास के पेड़ों पर ऐसे दरख़्त देवता बखूबी डेरा जमाये रखते हैं। बस अंतर इतना होता है कि यदि वे घर या मंदिर के भीतर विराजमान होते तो वहां इनका पूरा सत्कार होता। स्नान -ध्यान, धूप -बत्ती, भोग -प्रसाद आदि से।

यहाँ सड़क पर लगे पेड़ों के नीचे इन्हें कोई नहीं पूछता। यहाँ तक की कोई दो घड़ी रुक कर सर तक नहीं झुकाता। जुलम !! केवल स्थान बदल जाने से, सत्ता बदलने से, कुर्सी बदलने से इतना बड़ा अंतर ?  

सोचती हूँ पुराने हो जाने पर या जरा सा भी खंडित हो जाने से यदि देवताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है फिर इंसानों की क्या क़दर ? बुज़ुर्ग हुए, पुराने हुए, बीमार हुए.... सब बाहर। 

एक बड़ा सवाल ये भी है कि इस टाईप के महान भक्तों के पास यदि इन देवताओं के लिए अपने घर में जगह नहीं रह जाती है तो वो इन्हें कूड़े में क्यों नहीं फेंक देते? पेड़ों के नीचे या मंदिरों में क्यों बैठा जाते हैं ? क्या दिल में कोई चोर होता होगा ? शायद गलत कर रहे हैं ? या मन के किसी कोने में कुंठा होती होगी ? या शगुन -अपशगुन का भय ?

क्या भगवान् इस बात के लिए इन्हें माफ़ कर देते होंगे कि शुक्र है कमसकम पेड़ के नीचे तो बैठा गए कूड़े में नहीं फेंका ? हमेशा की तरह मेरे अनुत्तरित प्रश्न... 


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